
रायपुर, न्यूज डेस्क। छत्तीसगढ़ के की ऊर्जाधानी कोरबा स्थित हसदेव ताप विद्युत गृह (पूर्व) के राखड़ बांध (Ash Dyke) के फूटने से हुए भीषण जल प्रदूषण के मामले में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (CECB) ने कड़ा रुख अपनाया है। मंडल ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के नियमों का खुला उल्लंघन पाए जाने पर छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (CSPGCL) पर 27 लाख 60 हजार रुपये की भारी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation Penalty) अधिरोपित की है। विभाग द्वारा की गई इस एकतरफा दंडात्मक कार्रवाई के बाद से ही बिजली कंपनी के प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारियों के बीच हड़कंप मचा हुआ है।
राखड़ बांध में दरार: कैसे शुरू हुआ तबाही का यह सिलसिला?
पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा जारी की गई विस्तृत जांच रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा मामला राखड़ बांध की दीवार में आई एक बड़ी दरार से शुरू हुआ था। बांध की सुरक्षा दीवार टूटने के कारण भारी मात्रा में राख मिश्रित जहरीला पानी (Ash Blended Water Discharge) तेजी से बाहर निकल गया। देखते ही देखते यह प्रदूषित मलबा आसपास के रिहायशी ग्रामीण क्षेत्रों, कृषि भूमियों और वहां मौजूद प्राकृतिक जल स्रोतों (Natural Water Resources) में अनियंत्रित रूप से फैल गया। इस भीषण लीकेज के कारण न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति हुई, बल्कि इंसानों और मवेशियों के लिए पीने के साफ पानी का संकट भी गहरा गया।
39 दिनों तक जारी रहा प्रदूषण: तारीख-दर-तारीख लापरवाही का पूरा सच
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात प्रदूषण की समयावधि है। पर्यावरण संरक्षण मंडल के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 18 मार्च 2026 से लेकर 25 अप्रैल 2026 तक लगातार 39 दिनों तक राख मिश्रित पानी का बहाव बिना किसी रुकावट के जारी रहा। इस दीर्घकालिक प्रदूषण (Prolonged Environmental Pollution) को ही आधार बनाकर मंडल ने जुर्माने की इतनी बड़ी राशि तय की है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जब पहली बार 18 मार्च 2026 को मंडल की विशेष जांच टीम ने बांध का आकस्मिक निरीक्षण (Surprise Inspection) किया, तो वहां लगातार राख युक्त पानी का भारी रिसाव पाया गया। इसके तुरंत बाद प्रबंधन को जल तथा वायु प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कड़े प्रावधानों के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई (Corrective Action) करने का सख्त अल्टीमेटम दिया गया था।
विभागीय निर्देशों के बावजूद धरातल पर स्थिति में कोई अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। इसके चलते 19 अप्रैल 2026 को दोबारा स्थल निरीक्षण किया गया। इस दूसरी जांच में भी पाया गया कि राख का रिसाव लगातार जारी है और वह जहरीला पानी बहते हुए हसदेव बैराज क्षेत्र तक पहुंच चुका है। इसके बाद विभाग ने 22 अप्रैल को दूसरा नोटिस जारी कर प्रभावी नियंत्रण उपाय करने का अंतिम आदेश दिया।
प्रबंधन की दलीलें खारिज: ‘लैमून-बी’ के क्षतिग्रस्त होने का बहाना नहीं आया काम
जब पर्यावरण मंडल ने कड़ा रुख अपनाया, तब जाकर सीएसपीजीसीएल (CSPGCL Management) के प्रबंधन ने अपना लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया। कंपनी ने अपने जवाब में इस औद्योगिक दुर्घटना का मुख्य कारण ‘लैमून-बी’ (Lagoon-B) के अचानक क्षतिग्रस्त होने को बताया। कंपनी का दावा था कि घटना की जानकारी मिलते ही राखयुक्त पानी का डिस्चार्ज बंद करने के लिए युद्धस्तर पर मरम्मत कार्य शुरू कर दिया गया था। साथ ही प्रबंधन ने यह भी दावा किया कि 25 अप्रैल से हसदेव बैराज की ओर जाने वाले प्रदूषित प्रवाह को पूरी तरह से रोक दिया गया था।
हालांकि, पर्यावरण संरक्षण मंडल ने बिजली कंपनी के इस स्पष्टीकरण को पूरी तरह से नाकाफी और गैर-जिम्मेदाराना मानते हुए राहत का आधार मानने से साफ इनकार कर दिया। मंडल का स्पष्ट मत था कि निर्धारित अवधि तक इतने लंबे समय तक प्रदूषण जारी रहने से गंभीर पर्यावरणीय क्षति (Ecological Damage) हुई है, जिससे कंपनी किसी भी सूरत में अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती।
क्षेत्रीय अधिकारी प्रसन्ना सोनकर का बड़ा बयान: भविष्य के लिए सख्त निर्देश
पर्यावरण संरक्षण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी (Regional Officer) प्रसन्ना सोनकर ने इस मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि निरीक्षण के दौरान राखयुक्त पानी के प्राकृतिक जल स्रोतों तक पहुंचने और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने की शत-प्रतिशत पुष्टि हुई थी। प्रबंधन को समय-समय पर नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन प्रदूषण लगातार जारी रहने के कारण अंततः नियमों के तहत पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति अधिरोपित की गई।
इस बड़ी कार्रवाई के बाद अब राखड़ बांध की निगरानी और रखरखाव व्यवस्था (Dam Safety and Maintenance) पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पर्यावरण मंडल ने संयंत्र प्रबंधन को भविष्य में ऐसी गंभीर घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अपनी सुरक्षा और एडवांस निगरानी व्यवस्था को तत्काल मजबूत करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
उद्योगों के लिए कड़ा संदेश
कोरबा की यह घटना यह साबित करती है कि औद्योगिक विकास की आड़ में पर्यावरण को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। फ्लाई ऐश का इस तरह नदियों और बैराज में मिलना जनस्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा लगाया गया यह ₹27.60 लाख का जुर्माना अन्य बिजली संयंत्रों और उद्योगों के लिए भी एक कड़ा सबक है कि वे अपने अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management System) को लेकर कतई लापरवाही न बरतें।







