
रायपुर। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लाखों पेंशनर्स के लिए एक राहत देने वाली और बड़ी खबर सामने आई है। राज्य पुनर्गठन (state reorganization) के 26 वर्ष बाद अब दोनों राज्यों के बीच पेंशनर्स की महंगाई राहत (डीआर) के भुगतान को लेकर चली आ रही जटिल प्रक्रिया हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है।
दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण में प्रकाशित एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने छत्तीसगढ़ सरकार को एक पत्र लिखकर यह आधिकारिक प्रस्ताव (official proposal) भेजा है कि महंगाई राहत (DR) के भुगतान के लिए हर बार दोनों राज्यों की आपसी सहमति लेने की अनिवार्यता को अब पूरी तरह समाप्त किया जाए और इसके लिए एक स्थायी व्यवस्था (permanent mechanism) बनाई जाए।
बार-बार सहमति लेने की प्रक्रिया अब व्यावहारिक नहीं
मध्य प्रदेश सरकार का स्पष्ट मत है कि राज्य विभाजन के ढाई दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद अब दोनों राज्यों के अधिकारी-कर्मचारियों एवं पेंशनरों का विभाजन पूरी तरह पूर्ण हो चुका है। इसके साथ ही दोनों राज्यों के वित्तीय दायित्व (fiscal liabilities) भी पूरी तरह से निर्धारित और तय हैं। ऐसी स्थिति में पेंशनर्स की महंगाई राहत जैसे नियमित मामलों में बार-बार अंतरराज्यीय सहमति लेने की प्रशासनिक प्रक्रिया अब व्यावहारिक नहीं रह गई है। इस पुरानी व्यवस्था के कारण फाइलों के मूवमेंट में वक्त लगता है, जिसके चलते बुजुर्ग पेंशनरों को समय पर उनके वित्तीय लाभ मिलने में अनावश्यक और लंबा विलंब (administrative delay) होता है।
वित्त सचिव रोहित यादव के साथ हुई बैठक में मिले थे सकारात्मक संकेत
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ, छत्तीसगढ़ द्वारा इस व्यवस्था को बदलने के लिए लंबे समय से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी सिलसिले में हाल ही में नवा रायपुर स्थित मंत्रालय महानदी भवन में वित्त सचिव रोहित यादव (Finance Secretary Rohit Yadav) के साथ महासंघ की एक उच्च स्तरीय बैठक संपन्न हुई थी, जिसमें इस मुद्दे पर बेहद सकारात्मक चर्चा (positive discussion) हुई थी। महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष एवं राष्ट्रीय महामंत्री वीरेन्द्र नामदेव के नेतृत्व में गए एक प्रतिनिधिमंडल ने मध्य प्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 49(6) को पूरी तरह समाप्त करने या उसमें आवश्यक संशोधन करने की मांग प्रमुखता से सचिव के सामने रखी थी।

इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान वित्त सचिव ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया था कि छत्तीसगढ़ शासन भी पेंशनरों को महंगाई राहत प्रदान करने के लिए मध्य प्रदेश की सहमति लेने की इस वर्तमान व्यवस्था को समाप्त करने के विषय पर बेहद गंभीरता से विचार कर रहा है और इस संबंध में राज्य सरकार स्तर पर शीघ्र ही कोई बड़ा निर्णय लिया जा सकता है।
दोनों राज्यों के 7 लाख पेंशनर्स का साझा हित
भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ का मानना है कि यह गंभीर विषय केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के पेंशनभोगियों के हितों से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
वर्तमान में लागू इस जटिल और पुरानी व्यवस्था के कारण दोनों राज्यों के लाखों बुजुर्गों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है:
- महंगाई राहत में देरी: केंद्र सरकार द्वारा घोषणा किए जाने के बावजूद दोनों राज्यों की आपसी फाइल क्लियरेंस के चक्कर में महीनों तक पेंशनर्स को बढ़ा हुआ लाभ नहीं मिल पाता।
- एरियर का भुगतान रुकना: पेंशन लाभों और महंगाई राहत के पिछले एरियर (arrears) का समय पर भुगतान प्रशासनिक उलझनों के कारण अटक जाता है।
- बड़ी आबादी प्रभावित: इस सुस्त प्रशासनिक प्रक्रिया से दोनों राज्यों के अनुमानित 7 लाख पेंशनर सीधे प्रभावित होते हैं, जिनमें अकेले छत्तीसगढ़ राज्य के 1.30 लाख पेंशनर शामिल हैं।
महासंघ का तर्क: धारा 49(6) अब समयानुकूल नहीं
महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव ने इस ऐतिहासिक कदम का स्वागत करते हुए कहा कि वर्ष 2000 में राज्य पुनर्गठन के समय वित्तीय दायित्वों के सुचारू बंटवारे के लिए बनाए गए तात्कालिक प्रावधान उस दौर की प्रशासनिक आवश्यकता थे। लेकिन आज 25 वर्ष से भी अधिक का लंबा समय बीत जाने के बाद, दोनों ही राज्यों की स्वतंत्र वित्तीय, प्रशासनिक और कोषागार व्यवस्थाएं (treasury systems) पूरी तरह से स्थापित और आत्मनिर्भर हो चुकी हैं।
उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि ऐसे विकसित समय में भी बुजुर्ग पेंशनरों के वैधानिक और मौलिक अधिकारों को अंतरराज्यीय सहमति की कछुआ गति वाली प्रक्रिया से जोड़कर रखना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं है। पेंशन किसी भी कर्मचारी का जीवनभर की सेवा के बदले अर्जित अधिकार (earned right) है और महंगाई राहत (DR) उसका एक अभिन्न हिस्सा है, इसलिए इसके भुगतान की राह में आने वाली सभी प्रशासनिक बाधाओं को तत्काल हटाया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार से भी संयुक्त पहल की अपेक्षा
मामले के स्थायी और वैधानिक समाधान के लिए भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय तथा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से संयुक्त रूप से आग्रह किया है। महासंघ का कहना है कि दोनों राज्य सरकारें मिलकर भारत सरकार (केंद्र सरकार) को एक आधिकारिक अनुशंसा भेजें, ताकि मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 की धारा 49(6) में आवश्यक विधायी संशोधन या उसके निरस्तीकरण (repeal) की प्रक्रिया को संसद के माध्यम से प्रारंभ कराया जा सके।
महासंघ ने भोपाल के समाचार पत्रों में आए मध्य प्रदेश सरकार के इस रुख और छत्तीसगढ़ के वित्त सचिव द्वारा दिए गए सकारात्मक संकेतों की सराहना की है। लाखों बुजुर्गों को उम्मीद है कि दोनों राज्य सरकारें संवेदनशीलता दिखाते हुए इस 26 साल पुराने विवाद का स्थायी समाधान जल्द करेंगी, ताकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लाखों पेंशनरों को बिना किसी रुकावट के समयबद्ध और निर्बाध रूप से महंगाई राहत तथा अन्य पेंशन लाभ प्राप्त हो सकें।







